Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 24, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 24, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
पुर्यष्टककलत्रेण तन्मात्रस्वजनेन च ।
अहंकारगृहस्थेन सर्वतः परिपालितम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
यह, पुर्यष्टकरूपी कलत्र से पुर्यष्टक-मात्रारूपी
स्वजन यानी बन्धुवर्गो से एवं अहंकाररूपी गृहस्थ से रक्षित हे