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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 24, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 24, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

युष्मदादिषु सुप्रापा दुष्प्रापैवास्मदादिषु । समस्तकलनातीतं परां कोटिमुपागतम् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

महात्मन्‌, आपके जैसे उत्तम पुरुषों में वह आत्मदृष्टि सुलभ है ओर हम लोगों के सदृश पामरों मे वह दुलर्भ ही है। महाराज, सामान्यबुद्धि यानी अविशुद्ध प्राकृत बुद्धिवाले प्राणी इस पद को, जो समस्त कल्पनाओं से परे ओर परम चरम सीमा को पहुँचा हुआ है, केसे प्राप्त कर सकते हैं ?