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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 25, Verse 61

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 25, verse 61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 61

संस्कृत श्लोक

पुष्पस्यान्तरिवामोदः प्राणस्यान्तरवस्थितम् । न स प्राणं न वाऽपानं चिदात्मानमुपास्महे ॥ ६१ ॥

हिन्दी अर्थ

उस प्रकार तत्‌-तत्‌ भिन्न-भिन्न क्रियाओं के भेद से भिन्न-भिन्न हुए प्राणोपासना के प्रकार को कहकर अब उसकी दढता के अनन्तर प्राण, अपान आदि के अन्दर रहनेवाले उनके अधिष्ठानभूत चैतन्यात्मा की उपासना करनी चाहिए, इस आशय से कहते हैं। ब्रह्मन्‌, जिस प्रकार पुष्प के अन्दर सुगन्धि रहती है, उसी प्रकार प्राण के अन्दर रहनेवाले चिदात्मा की, जो न सजीवस्वरूप है और न निर्जीवस्वरूप है (79), हम लोग उपासना करते हैं