Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 26, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 26, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 26 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
काष्ठं विलासिनीं शैलं तृणमग्निं हिमं नभः ।
समं सर्वत्र पश्यामि तेन जीवाम्यनामयः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
चूँकि मैं लकड़ी, विलासिनी रमणी, पर्वत, तिनका, अग्नि, हिम,
आकाश इन सबमें एकरूपता ही देख रहा हूँ, इसलिये विकार वर्जित होकर जी रहा हूँ