Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 27, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 27, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
तेनार्घ्यपाद्यपुष्पेण त्रिनेत्रमिव मामसौ ।
आपादमस्तकं भक्त्या पूजयामास पूर्वजः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामजी, उक्त अर्घ्य, पाद्य और पुष्प से संसार में सबसे पहले उत्पन्न हुए यानी चिरन्तन
इस भुशुण्ड ने तीन नेत्रवाले महादेवजी के सदृश मेरी पैर से लेकर मस्तक पर्यन्त भक्तिपूर्वक पूजा
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