Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 27, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 27, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
मयि याते क्षणेनैव गगनाध्वन्यदृश्यताम् ।
निवृत्तोऽसौ विहंगेन्द्रो दुस्त्यजा संगतिः सताम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
क्षणभर में ही मेँ आकाशमार्ग में जब अदृश्य हो गया, तभी
वह पक्षिराज अपने स्थान के लिए लौटा | ठीक ही है, सज्जनो की संगति का बड़ी कठिनाई से त्याग
होता है