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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 27, Verse 16

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 27, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

अन्योन्यमपि कस्मिंश्चित्तरङ्गक इवाम्बुधौ । व्योमन्यदृश्यतां यातो खगस्मृत्या मुनीनहम् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, आकाशमार्ग में कुछ दूर जाकर, समुद्र में तरंग की नाई, हम दोनों ही एक दूसरे के प्रति कहीं अदृश्य हो गये । भुशुण्ड का निरन्तर स्मरण करते हुए अरुन्धती से पूजित मैंने भी सप्तर्षि-मण्डल को प्राप्त कर मुनियों का दर्शन किया