Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 27, Verses 17–18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 27, verses 17–18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 27 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
सप्तर्षिमण्डलं प्राप्य जायया परिपूजितः ।
याते कृतयुगस्यादौ पुरा वर्षशतद्वये ॥ १७ ॥
संगतोऽहं भुशुण्डेन मेरोः शृङ्गद्रुमेऽभवम् ।
अद्य राम कृते क्षीणे त्रेता संप्रति वर्तते ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त भुशुण्ड-संगति का समय कहते है।
श्रीरामजी, सत्ययुग के प्रथम दो शतक जब व्यतीत हो चुके थे, तब मेरूपर्वत के तथाकथित
कल्पवृक्ष पर भुशुण्ड के साथ मेने पहले-पहल भेंट की थी