Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
परिभ्रमसि मेरुं वा स देहस्ते क्व संस्थितः ।
स्वप्नेष्वपि च यः स्वप्नस्तत्र येन महीतटान् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, स्वप्नों में भी जो दूसरा स्वप्न आता
है, उस स्वप्न में जिस देह से बड़े-बड़े पृथिवी-तटों पर आप परिभ्रमण करते हैं, वह आपकी देह
कहाँ स्थित है ?