Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 61
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 61 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
कौ तौ मे सदसद्भावौ यन्निष्ठं परितप्यते ।
इति निश्चयवत्स्वान्तं सम्यग्ज्ञानात्मनो मुनेः ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे प्रिय श्रीरामजी,
सम्यकृज्ञान से युक्त मुनि का पूर्वोक्त प्रकार के निश्चयवाला अन्तःकरण न कभी अस्त होता है, न
उदित होता है और न अन्त में दुःखित ही होता है