Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 63
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 63
संस्कृत श्लोक
आदत्ते तित्तिरी मृद्वीं तृणकोटिमिवामलाम् ।
एतदर्थमसत्येऽस्मिन्नास्था कार्या मनागपि ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, संसार की
जडता का परित्याग करने के लिए असत्यभूत इस संसार में तनिक भी आसक्ति नहीं रखनी चाहिए,
क्योकि आसक्ति से ही, दृढ़ रज्जु से बैल की नाई, प्राणी बद्ध हो जाता हे