Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 73
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 73 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 73
संस्कृत श्लोक
यदेकमेतयोवेत्सि रम्यं तद्राम संश्रय ।
द्वाभ्यामेवाथ वै ताभ्यां दर्शनाभ्यामिहानघ ॥ ७३ ॥
हिन्दी अर्थ
इनका ऐच्छिक समुच्चय करने पर भी परस्पर कोई विरोध नहीं है, क्योकि फलतः दोनों एकरूप ही
है, इस आशय से कहते है।
हे कल्याणरूप पापरहित राघव, अथवा इन्हीं दो भावनाओं का आश्रय कर इस संसार में विहार
करते हुए आप राग, द्वेष आदि का विनाश कर डालिए (जिस पुरुष मे राग आदि दोषों का विनाश
हो गया है, उसी पुरूष में उक्त दोनो चिन्तन सफल होते हैं, दूसरे में नहीं यह कृरु" इत्यादि वाक्य
से दिखलाया गया है ।)