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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 28, Verse 74

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 28, verse 74 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 28 · श्लोक 74

संस्कृत श्लोक

विहरन्कुरु कल्याण रागद्वेषपरिक्षयम् । यत्किंचिदुदितं लोके यन्नभस्यथ वा दिवि ॥ ७४ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रधान फलों के द्वारा राग आदि दोषों के विनाश की ही स्तुति करते हैं। हे श्रीरामजी, जो कुछ भी इस संसार में उत्तम वस्तु है ओर जो कुछ आकाश में या स्वर्ग में उत्तम वस्तु है, एकमात्र राग, द्वेष आदि के विनाश से ही उन सबकी प्राप्ति हो जाती है