Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 122
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 122 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 122
संस्कृत श्लोक
आकारादिपरिच्छिन्ने मिते वस्तुनि तत्कुतः ।
अकृत्रिममनाद्यन्तं देवनं चिच्छिवं विदुः ॥ १२२ ॥
हिन्दी अर्थ
देश और वस्तु से परिच्छिन्न तथा काल से परिच्छिन्न
वस्तु में वह प्रकाश ही कहाँ रहता है ? (तात्पर्य यह है - “दिवु क्रीड़ा-विजिगीषा-व्यवहार-द्युति-
स्तुति-मोद-मद-स्वप्न-कान्ति- गतिषु" यों दस अर्थो में प्रसिद्ध दिव् धातु से "पचाद्यच्" इस सूत्र
से अचूप्रत्यय करने पर सिद्ध हुए देवशब्द के संकोच में प्रमाण न होने से वह मायिक निरंकुश ऐश्वर्य,
स्वच्छन्द क्रीडा, महत्वकांक्षा, व्यवहार, स्तुति तथा आविद्यक मद, स्वप्न, इच्छा ओर गति का
निर्वाहक है, अतः उक्त दशविध अर्थो में कौन मुख्य हैं; इसका विचार करने पर द्युति ओर मोद ही
मुख्य अर्थ प्रतीत होते हैं और वे नित्य, निरतिशयानन्दस्वरूप, स्वप्रकाश परब्रह्मरूप में ही उपपन्न
हो सकते हैं, परिच्छिन्न जड़ों में नहीं ।) इसलिए आदि और अन्त से शून्य, स्वाभाविक जो
प्रकाशस्वरूप चित् है, उसी को मुनि लोग शिव और देव कहते हैं