Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 125
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 125 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 125
संस्कृत श्लोक
इयत्तादिपरिच्छिन्नं रुद्रादेः प्राप्यते फलम् ।
अकृत्रिममनाद्यन्तं फलमानन्द आत्मनः ॥ १२५ ॥
हिन्दी अर्थ
पूजन आदि से प्रसन्न हुए रुद्र आदि देवताओं से इयत्ता आदि से परिच्छिन्न ही फल
प्राप्त होता है और तत्त्वतः साक्षात्कारपर्यन्त पूजन से प्रसन्न हुई आत्मा से तो स्वाभाविक तथा आदि
एवं अन्त से वर्जित निरतिशयानन्दरूप फल प्राप्त होता हे