Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 127
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 127 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 127
संस्कृत श्लोक
बोधः साम्यं शम इति पुष्पाण्यग्राणि तत्र च ।
शिवं चिन्मात्रममलं पूज्यं पूज्यविदो विदुः ॥ १२७ ॥
हिन्दी अर्थ
तो अकृत्रिम पूजन में कौन-सी सामग्री है ? इस शंका पर उस सामग्री का उल्लेख करते हैं।
कौन पूज्य है इस विषय का तात्त्विक ज्ञान रखनेवाले विद्वान कहते हैं कि एकमात्र चित्स्वरूप निर्मल
प्रयोग से तथा “त्वचे स्वाहा लोमभ्यः स्वाहा“ इत्यादि मन्त्रलिंग से देह आदि आध्यात्मिक भावों में प्राप्त
हुई देवस्वरूपता का निवारण करते हैं ।
(&) आध्यात्मिक पदार्थों का उपक्रम होने के कारण कमलाशब्द से यहाँ देहादि की शोभा ही ली गई
है । मतिशब्द समस्त आध्यात्मिक पदार्थो का उपलक्षण है । इसी न्याय से समस्त आधिभौतिक पदार्थों
में भी देवरूपता नहीं है, यह जान लेना चाहिए ।
शिव ही पूज्य है और उसकी पूजन-सामग्री में विवेक-ज्ञान, सर्वभूतों में आत्मबुद्धि और शम-ये सबसे
श्रष्ठ पुष्प हैँ ।