Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 152
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 152 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 152
संस्कृत श्लोक
संकल्पने स्वप्नपुरे शरीरं चिद्व्योमतोऽन्यन्न यथास्ति किंचित् ।
तथेह सर्गे प्रथमैकर्सगान्मुने प्रभृत्यस्ति न रूपमन्यत् ॥ १५२ ॥
हिन्दी अर्थ
कथित प्रकरण का, अनुवादपूर्वक, उपसंहार करते हैं।
हे मुने, जिस प्रकार संकल्पमय पदार्थों तथा स्वप्न-नगर में चैतन्याकाशको छोड़कर दूसरा कुछ
भी पारमार्थिकस्वरूप पदार्थ नहीं है उसी प्रकार हिरण्यगर्भ के प्रथमसर्ग से लेकर आजतक चले आ रहे
इस संसार में चैतन्याकाशरूप पारमार्थिक शरीर को छोड़कर दूसरा कुछ भी पदार्थ नहीं है