Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 69
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 69 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 69
संस्कृत श्लोक
संशान्तचित्तवेतालं गुरुशास्त्रार्थबान्धवाः ।
शक्नुवन्ति समुद्धर्तुं स्वल्पपङ्कान्मृगं यथा ॥ ६९ ॥
हिन्दी अर्थ
जिस पुरुष का
चित्तरूपी वेताल अपने दुष्ट व्यापारो से विरत हो चुका है यानी जिसका चित्त शुद्ध हो चुका है ऐसे पुरूष
का गुरु, शास्त्र, धन ओर बन्धु ऐसा उद्धार कर सकते हैं, जैसा अल्प कीचड़ से बछड़े का