Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 94
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 94 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 94
संस्कृत श्लोक
समाधिं तनुतां नीत्वा स्थितोहं बाह्यमग्नदृक् ।
अपश्यं कानने तेजो झटित्येव समुत्थितम् ॥ ९४ ॥
हिन्दी अर्थ
उस समय उस अरण्य में तत्काल ही उत्पन्न हुआ एक बड़ा तेज मैंने देखा, जो शुभरातिशुभ्र
सैकड़ों मेघों के तुल्य धवल एवं असंख्य चन्द्रविम्बों के सदुश चमकीला था