Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 96
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 96 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 96
संस्कृत श्लोक
अन्तःप्रकाशशालिन्या बहिर्दृष्ट्यावलोकितम् ।
यावत्पश्यामि तं सानुं प्राप्तश्चन्द्रकलाधरः ॥ ९६ ॥
हिन्दी अर्थ
विचार कर ज्यों ही मैं सामने का शिखर प्रदेश
देखता हूँ, त्यों ही चन्द्रकलाधर महादेवजी उपस्थित हो गये । उन्होने अपना एक हाथ भगवती गोरी के
हाथ में रक्खा था ओर उनके गण नन्दी आगे चलनेवालों को हटा रहे थे