Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 29, Verse 97
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 29, verse 97 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 29 · श्लोक 97
संस्कृत श्लोक
गौरीकरार्पितकरो नन्दिप्रोत्सारिताग्रगः ।
शिष्यान्संबोध्य तत्रस्थान्गृहीत्वार्घ्यं सुसंयतः ॥ ९७ ॥
हिन्दी अर्थ
वहाँ उपस्थित समस्त
शिष्यों को सम्बोधित कर तथा अर्घ्यपात्र लेकर सावधान एवं प्रसन्न-मन हुआ मैं उन गौरीपति की
दृष्टि से पवित्र ऐसे उनके पुरोभाग में गया यानी उनकी पवित्र सन्निधि में पहुँचा