Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 32, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
पुर्यष्टकं वातमयं देहमुत्थापयत्यलम् ।
हृत्स्पन्दिवेताल इव जीवतीत्युच्यते तदा ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
और जब सूत्रात्मा प्राणवायु से भरे हुए इस पुर्यष्टकरूप शरीर को पर्याप्तरूप से और ऊपर उठाता है,
तब हृदय में प्रवेशकर स्पन्दनशील हुए वेताल से युक्त शव की नाई “यह देह जीती है" यों लोगों द्वारा
कहा जाता है