Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 32, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 32, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 32 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
क्षीणे पुर्यष्टके चित्तं यदा व्योमनि लीयते ।
तदा स्फुरति देहोऽयं मृत इत्युच्यतेऽपि च ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
एवं पुर्यष्टक के क्षीण हो जाने पर यह चित्त हृदयाकाश मे जव विलीन हो जाता है
तब यह देह काष्ठ, ढेला आदि की नाई स्पष्ट अचेतन प्रतीत होती है और (उस समय) लोगों के द्वारा
“यह देह मर गई" यों भी कहा जाता है