Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
चित्तत्त्वं चित्तचेत्येहं चिद्ब्रह्माद्यभिधा स्मृता ।
यथा वीच्याद्यभिधार्हं स्थितमम्बुतरङ्गकम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे जल, तरंग आदि में
अनुगत जलसामान्य वीचि आदि नामयोम्य होकर स्थित है, वैसे ही चित्त, चेत्य ओर उनकी चेष्टाओं
का समूहरूप रूपप्रपंच एवं ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त नामप्रपंच भी चितिस्वरूप होकर अवस्थित हे,
यह तत्त्वज्ञो का कथन हे