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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

द्वित्वसंकल्पतो द्वित्वमेकस्यैव प्रवर्तते । अद्वित्वसंविदा द्वित्वमनेकस्यापि नश्यति ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

द्वेतसंकल्प से अद्वितीय वस्तु में भी द्वित्व की प्राप्ति हो जाती है ओर अद्वैतभावना से तो अनेकात्मक जगत का भी द्वित्व नष्ट हो जाता हे