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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

परमात्मतया द्वित्वं न किलात्मनि विद्यते । अविकारादिमत्त्वेन सर्वगत्वेन सर्वदा ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, विकार आदि से शून्य, सदा सर्वगामी तथा परमात्मा का स्वरूपभूत होने से आत्मा में कभी द्वेतभाव नहीं रहता