Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
तथा संकल्पने क्लेशो न संकल्पविनाशने ।
संकल्पयक्षो गन्धर्वपुर्याः सृष्टौ न तु क्षये ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
मानसिक प्रयत्न के द्वारा किसी की रचना करने
में तो श्रम होता भी है, परन्तु संकल्प का विनाश करने में तो कुछ भी श्रम नहीं होता । (क्योकि एकमात्र
उदासीनता का अवलम्बन करने से अपने-आप संकल्प विनाश सिद्ध हो जाता है । यह बात प्रसिदही
है, यह कहते हैं ।) ठीक ही है मन के मनोरथो से रचित नगरों के निर्माण में एकमात्र संकल्प ही,
असंभावित रचना में समर्थ होने के कारण, दिव्य शिल्पी प्रसिद्ध है, परन्तु उन नगरों के विनाश में
नहीं