Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
यत्किंचिदपि संकल्प्य नरो दुःखे निमज्जति ।
न किंचिदपि संकल्प्य सुखमव्ययमश्नुते ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
तनिक भी संकल्प कर मनुष्य दु:ख में
डूब जाता है ओर कुछ भी संकल्प न कर वह अविनाशी सुख पाता है