Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
संकल्पसरितं मत्तां मणिमन्त्रेण शोषय ।
तत्रोह्यमानमात्मानं समाश्वास्य भवामनाः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
तब संकल्पनाश का क्या उपाय है ? इस प्रश्न पर उसका उपाय बतलाते हैं।
हे मुने, अपने विवेकरूपी पवन से संकल्परूप मेघो का विनाशकर, शरत्काल मेँ आकाश-मण्डल
की नाई, तुम उत्तम निर्मलता प्राप्त करो ॥ ३ ७॥ अविवेकरूप प्रबल प्रवाह से उमड़ रही उन्मत्त संकल्परूप
नदी तुम मणिमन्त्र से सुखा दो । और उसमें बह रहे आत्मा को धैर्य देकर मन से रहित हो जाओ