Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verses 41–42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verses 41–42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
सर्वशक्तिमयो ह्यात्मा यद्यथा भावयत्यलम् ।
तत्तथा पश्यति तदा स्वसंकल्पविजृम्भितम् ॥ ४१ ॥
संकल्पमात्रमेवेदं जगन्मिथ्यात्वमुत्थितम् ।
असंकल्पनमात्रेण ब्रह्मन्क्वापि विलीयते ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
चूँकि, यह आत्मा समस्त शक्तियों से परिपूर्ण है, अतः जब कभी वह किसी वस्तु की
जैसी भी पर्याप्तरूप से भावना करता है, अपने संकल्प के विलास से उस वस्तु को उसी समय वैसा ही
देखता हे