Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 33, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 33, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 33 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
संकल्पवातवलितं जन्मजालकदम्बकम् ।
असंकल्पानिलस्पर्शाद्विश्राम्यति परे पदे ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे ब्रह्मन्, यह उत्पन्न हुआ मिथ्यारूप जगत एकमात्र संकल्पात्मक ही हे, अतः केवल
संकल्प के अभाव से ही, न जाने, कहीं भी विलीन हो जाता है ॥४ २॥ संकल्परूपी पूर्वी हवा से व्यथित
जन्मस्वरूप मेघो का समूह असंकल्परूप पश्चिमी हवा के स्पर्श से ब्रह्माकाश में विलीन हो जाता
है