Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 34, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 34, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
एषा दृक्चेत्यवलनादनामार्थापदं गता ।
ब्रह्मात्मेत्यादिशब्दार्थादतीतोदेति केवला ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
तृतीय भूमिका में पहले की भूमिकाओं की अपेक्षा जो विशेषधर्म हैं, उन्हे कहते हैं।
यह चिति तृतीय भूमिका में ब्रह्माकार अखण्डवृत्ति ओर उस वृत्ति का विषय ब्रह्म इन दोनों का
नीरक्षीर न्याय से एकीकरण हो जाने के कारण ग्राहक अंश और ग्राह्य अंश से शून्यरूप स्थिति को प्राप्त
हो जाती है, इसीलिए ब्रह्म, आत्मा इत्यादि शब्द ओर अर्थो से निर्मुक्त हुई विशुद्धरूप से उदित होती
है । तात्पर्य यह है कि पहले की भूमिका संप्रज्ञातसमाधि से प्राप्य है ओर यह तृतीय भूमिका असंप्रज्ञात
समाधि की सुदृढ़ स्थिति से प्राप्य हे, यह विशेष हुआ