Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 38, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 38, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 38 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
विधानमर्चनस्येदं श्रृणु ब्रह्मविदां वर ।
स्वसंविदात्मा देवोऽयं नोपहारेण पूज्यते ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
महर्षे, स्वानुभवस्वरूप इस आत्मचैतन्य का पूजन न
गन्ध आदि के उपहार से न दीप से, न धूप से ओर न तो फूल एवं धन के समर्पण से ही हो सकता
है