Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 39, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
कलाकलङ्करहितं कठिनं च कलागणैः ।
एकदेशे सुहृत्पद्मे सर्वदेहे च संस्थितम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
जो कलाओं की कल्पनाओं से शून्य ओर स्थूल देह रूप से
परिणत भूतमात्राओं से कठिन यानी मूर्त है, जो देह के एकदेशभूत सुन्दर हृदय-कमल में और सम्पूर्ण
देह मेँ स्थित हे (उस बोधलिंग का चिन्तन करना चाहिए)