Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 39, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
अनीहितं परित्यज्य परित्यज्य तथेहितम् ।
उभयाश्रयणेनापि नित्यमात्मानमर्चयेत् ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
मिथ्यात्व-दुष्टि से अभीष्ट वस्तु का परित्याग कर
और अनभीष्ट वस्तु का भी परित्याग कर एवं "सभी आत्ममात्ररूप है" इस बुद्धि से उन दोनों का (अभीष्ट
ओर अनभीष्ट का) स्वीकार करके भी नित्य आत्मदेव की पूजा करनी चाहिए