Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 39, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 39, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 39 · श्लोक 52
संस्कृत श्लोक
उद्वेगो नानुगन्तव्यस्तुच्छाऽतुच्छासु दृष्टिषु ।
व्योम्ना चित्रपदार्थेषु पतितो ह्याततेष्विव ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
तुच्छ यानी अपमान आदि की तथा अतुच्छ अर्थात् वध, बन्ध, सर्वस्वनाश
आदि की परिस्थितियों में प्रसक्त उद्वेग को पुरुष उस प्रकार न प्राप्त होवे, जिस प्रकार चिरकाल से
अनुवृत्त सरल, टेढे, शीत, दाह आदि चित्र-विचित्र पदार्थों में आकाश उद्वेग को प्राप्त नहीं होता