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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 40, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 40, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 40 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

त्रिजगत्प्रसृताच्छाच्छसंविद्रूपस्य चात्मनः । नेश्वरस्याकृतेर्ब्रह्मन्व्यपदेशो हि युज्यते ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

हे ब्रह्मन्‌, तीनों जगत्‌ में फैले हुए स्वच्छातिस्वच्छ संविद्रूपी आत्मलक्षण ईश्वर की आकृति का वाणी से व्यवहार (व्यपदेश) भी नहीं किया जा सकता