Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
गुरुर्हीन्द्रियवृत्तात्मा ब्रह्म सर्वेन्द्रियक्षयात् ।
यद्वस्तु यत्क्षये प्राप्यं तत्तस्मिन्सति नाप्यते ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें दूसरी युक्ति बतलाते हैं।
क्योंकि इन्द्रियों से घटित (युक्त) जो पुर्यष्टक है, तत्स्वरूप तो गुरु है और ब्रह्म तो सम्पूर्ण
इन्द्रियों के क्षय से प्राप्य है। जो वस्तु जिसका नाश होने पर प्राप्त होती है, वह वस्तु उसके उपस्थित
रहते कभी प्राप्त नहीं हो सकती