Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 41, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 41, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 41 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
अकारणान्यपि प्राप्ता भृशं कारणतां द्विज ।
क्रमा गुरूपदेशाद्या आत्मज्ञानस्य सिद्धये ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
तब क्या गुरु आदि सव व्यर्थ हैं ? इस पर नहीं” ऐसा कहते हैं।
हे विप्र, गले में पहने हुए विस्मृत हार की, उसे पुनः किसी अन्य के द्वारा जता दिये जाने पर हुई
प्राप्ति की नाईं आत्मज्ञान के लाभ के लिए गुरु के उपदेश आदि क्रम कारणरूप न होते हुए भी अत्यन्त
कारणता को प्राप्त हो गये हैं