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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verses 27–28

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 42, verses 27–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 27,28

संस्कृत श्लोक

भवत्यङ्ग मृगीवीरुत्कीटदेवासुरादिकम् । यस्मिन्नित्ये ततेऽनन्ते दृढे स्रगिव तिष्ठति ॥ २७ ॥ सदसद्ग्रथितं विश्वं विश्वगे विश्वकर्मणि । न तद्दूरे न निकटे नोर्ध्वे नाधो न तेन मे । न पूर्वं नाद्य न प्रातर्न सन्नासन्न मध्यमम् ॥ २८ ॥

हिन्दी अर्थ

इसीलिए दृढ़ सूत्र में गुँथी गयी माला की नाई यह विश्व सत्‌ ओर असत्‌-रूप सूत्र में गुँथा गया स्थित है, ऐसा कहते हैं। नित्य, व्यापक, अनन्त, दृढ़ और विश्व के अन्दर रहनेवाले विश्व के कर्ता जिस परब्रह्म में माला की नाईं सत्‌ एवं असत्‌ से ग्रथित जगत्‌ रहता है; विवेक होने पर वह न दूर है, न समीप है, न ऊपर है, ननीचे है, न तुम्हारा है, न मेरा है, न पहले था, न आज है, न प्रातःकाल में है, न सत्‌ है, न असत्‌ है और न सत्‌ ओर असत्‌ के मध्य में रहनेवाला यानी अनिर्वचनीय है