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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verse 29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 42, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

अनुभवकलनामृतेऽस्य माता भवति न सर्वविकल्पनेष्वसत्सु । फलदुरुविभवा प्रमाणमाला स्थितिमुपयाति न वारिणीव वह्निः ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

इसीलिए अपना अनुभव ही एकमात्र उसमें प्रमाण है, लौकिक प्रमाता, प्रमाण आदि की वहाँ गति है ही नहीं, ऐसा कहते हैं। उक्त रीति से जब सभी विकल्प असद्रूप हैं तब इस आत्मतत्त्व का अनुभव करनेवाला स्वप्रकाश चैतन्य को छोड़कर दूसरा कोई पदार्थ नहीं हो सकता । इस परम तत्त्व में बड़े-बड़े व्यवहार-विभवों का प्रसव करनेवाली लौकिक प्रमाणमाला उस प्रकार अपनी स्थिति नहीं बना सकती, जिस प्रकार जल में अग्नि अपनी स्थिति नहीं बना सकता