Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 42, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 42, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 42 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
द्रष्टादिपुरुषस्त्वेवं स्वयं संपद्यते हि यः ।
स निमेषं प्रति व्योम समुदेत्यथ नीयते ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त रीति से जो आदि पुरुष स्वरचित वस्तु के प्रति
द्रष्टारूप हो जाता है, वह निमेषमात्र काल में ही एकमात्र अपने स्वरूप के पर्यालोचन से चिदाकाशस्वरूप
हो जाता है और स्वरूप का विस्मरण होने पर तो उसे निमेषमात्र काल ही अनन्त और असीम संसार के
प्रति ले जाता है