Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 44, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 44, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 44 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
चित्तस्पन्दोत्थिता माया तदभावे विलीयते ।
पयःस्पन्दोत्थिता वीचिस्तदभावे विनश्यति ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्त के स्पन्दन से जनित माया चित्तस्पन्दन का अभाव होने पर उस प्रकार विलीन हो जाती है,
जिस प्रकार जलस्पन्दन से जनित तरंग जलस्पन्दन का अभाव होने पर विलीन हो जाता है