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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 46, Verse 11

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 46, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 46 · श्लोक 11

संस्कृत श्लोक

कर्णिकाजालमूलानि मूलान्तःकर्णिकानि च । ऊर्ध्वमूलान्यधोमूलान्यमूलानीतराणि च ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

दिखाई पड़नेवाले पदार्थों से विपरीत भी मन की कल्पना हो सकती है, अतः यह कहते हैं। कुछ के मूल तो कमलों के छत्तों में (बीज कोशों में) हैं तो कुछ ऐसे हैं, जिनके मूल के अन्दर ही बीज कोश हैं । उन भुवनरूप कमलों के बीच किन्हीं के मूल ऊपर हैं, (क्योंकि स्वर्ग आदि भुवनों का आश्रय ऊपर स्थित ध्रुव-मण्डल ही है,) तो किन्हीं के मूल नीचे की ओर हैं (क्योंकि पाताल लोक, भूलोक आदि भुवनों का आश्रय बाह्य-स्थित कूर्म ही हे ।) (शिवलोक, विष्णुलोक आदि के नित्य होने से) कुछ मूलरहित हैं तो और कुछ दूसरे तिरछे मूलवाले हैं (क्योंकि कई ऐसे भी भुवन हैं, जिनका धारण तिर्यग्गति पवन ही करता है)