Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 49, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 49, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
विद्यमाने सदैकस्मिन्ब्रह्मण्येकान्तनिर्मले ।
संविद्भ्रमस्वरूपाया अविद्यायाः क आगमः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
चित्प्रकाशेकरस ब्रह्म में उससे विरुद्ध स्वभाववाली अविद्या की भला कैसे प्रसक्ति हो सकती है,
जिससे कि उसमें जगद्रूप विवर्त की सिद्धि हो, यों ज्ञानियों की दृष्टि से श्रीरामचन्द्रजी शंका करते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे ब्रह्मन्, निरंतर एकरूप तथा अत्यंत निर्मलस्वरूप सदात्मक ब्रह्म में
चिति-भरमरूप अविद्या का आगमन ही केसे होगा ?