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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 49, Verse 24

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 49, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

असंवेद्यमहासंवित्कोटिमात्रं जगत्त्रयम् । एकप्रत्ययवानन्तः कुर्वन्नपि न लिप्यसे ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

समस्त भ्रान्तियों के बाध की चरमसीमाभूत, लौकिक ज्ञान की अविषय महाचिति के स्वरूपभूत ही ये तीनों जगत्‌ हैं। श्रीरामचन्द्रजी, अपने हृदय के भीतर इस जगत्‌ और उस महासंवित्‌ में एक प्रतीति से युक्त होकर सांसारिक कार्यो का सम्पादन कर रहे भी आप उनसे लिप्त नहीं हो सकते | इस विषय में यह श्रुति भी प्रमाण है- "तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः*