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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 49, Verse 34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 49, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 34

संस्कृत श्लोक

एतदेवात्मविज्ञानाद्दग्धं सद्वासनाजलैः । संसिक्तमपि यत्नेन न भवत्यङ्कुरक्षमम् ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मज्ञान से दग्ध हुआ यही कल्पनारूपी बीज (चिद्रूपी खेत में) वासना रूपी जल से यत्नपूर्वक भलीभाँति सींचा गया भी अंकुर के उत्पादन में समर्थ नहीं होता