Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 49, Verse 36
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 49, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 49 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
द्वित्वं जगत्यसदुपात्तमबोधजातं बोधक्षयं जहिहि बोधमुपागतोऽसि ।
आत्मैकभावविभवेन भवाभयात्मा नास्त्येव दुःखमिति नः परमार्थसारः ॥ ३६ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रस्तुत उपदेश-रहस्य का उपसंहार करते है।
श्रीरामचन्द्रजी, चूँकि आप ज्ञान प्राप्त कर चुके है, इसलिए जगत् में भ्राति से गृहीत असत् द्वित्व
का (भेद का), जो अज्ञान से जनित ओर ज्ञान से विनाशी है, आप परित्याग कर दीजिए। भद्र, अब आप
आत्मैकत्वरूप निरतिशयानन्दरूपी विभव से अभयात्मा हो जाइये । आपमें तो तीनों काल में भी दुःख है
ही नहीं, यही हमारा उपदेश हे