Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 50, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
ज्ञातं ज्ञातव्यमखिलं दृष्टं द्रष्टव्यमक्षतम् ।
परेण परिपूर्णाः स्मो ब्रह्मज्ञानामृतेन ते ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
(अमृत-पान से) भलीर्भोति परिपूर्णं (तृप्त) हो चुके हैं