Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 50, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध), सर्ग 50, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 50 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
पूर्णात्पूर्णमिदं पूर्णं पूर्णात्पूर्णं प्रसूयते ।
पूर्णेनापूरितं पूर्णं स्थिता पूर्णे च पूर्णता ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने अनुभव के साथ - पूर्णमदः पूणमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय
पूणमिवावशिष्यते ॥ इस श्रुति का मेल भी है, यों बतलाते हैं।
पूर्णब्रह्म से निकलकर एवं शरीररूप उपाधि में प्रवेशकर नख के अग्रभागपर्यन्त व्याप्त हुआ यह
जीव परमार्थतः पूर्णब्रह्मरूप ही है; क्योकि पूर्ण से (ब्रह्म से) आकाशादि क्रमपूर्वक व्यष्टि-समष्टि-
उपाधिरूप जो उत्पन्न होता है, वह पूर्णरूप ही उत्पन्न होता हे । ओर महावाक्य से उत्पन्न “भे ब्रह्म ही
हूँ” इस ज्ञान से उपाधिजनित परिच्छिन्नता का समूल विनाश हो जाने के कारण, जब पूर्णब्रह्म से पूर्ण
ही जीवतत्त्व अखण्ड एेक्य से पूरित हो जाता है, तब कल्पित अपूर्णता भ्रम के नष्ट हो जाने से पूर्ण की
(ब्रह्म की) पूर्वस्थित पूर्णता ही अवस्थित रह जाती है